नहीं रहे ज्ञानपीठ विजेता, बहुभाषी अभिनेता गिरीश कर्नाड

ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता, बहुभाषी विद्वान, कुशल नाटककार, पटकथा लेखक, अभिनेता, निर्देशक और भारत के सांस्कृतिक परिदृश्य में एक महानायक गिरीश कर्नाड का सोमवार को यहां उनके आवास पर निधन हो गया। वह 81 साल के थे।

नहीं रहे ज्ञानपीठ विजेता, बहुभाषी अभिनेता गिरीश कर्नाड
गिरीश कर्नाड

ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता, बहुभाषी विद्वान, कुशल नाटककार, पटकथा लेखक, अभिनेता, निर्देशक और भारत के सांस्कृतिक परिदृश्य में एक महानायक गिरीश कर्नाड का सोमवार को यहां उनके आवास पर निधन हो गया। वह 81 साल के थे।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री कार्यालय के एक अधिकारी ने बताया, "कर्नाड का उम्र संबंधी बीमारियों के कारण  सोमवार सुबह करीब 8.30 बजे अपने घर में निधन हो गया।"

दिवंगत अभिनेता के परिवार में उनके बेटे रघु हैं, जो पेशे से लेखक और पत्रकार हैं।

पारिवारिक सूत्रों के अनुसार, उनका निधन प्रसिद्ध कब्बन पार्क के करीब शहर के संपन्न क्षेत्र के लावेल रोड स्थित आवास में हुआ। उनके शरीर के कई अंगों ने कई दिनों से काम करना बंद कर दिया था।

गिरीश कर्नाड को ज्ञानपीठ पुरस्कार के अलावा पद्मश्री और पद्मभूषण से भी सम्मानित किया गया था। इसके अलावा उन्हें कई नेशनल फिल्म अवार्ड और साहित्य अकादमी से भी नवाजा गया था।

वह एक सम्मानित विद्वान भी थे, जिन्होंने कई सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर आवाज उठाई थी।

छह दशकों के कार्यकाल में कर्नाड ने ज्यादातर मुख्यधारा और ऑफबीट शैली की कन्नड़ और हिंदी फिल्मों में अभिनय किया था। इसके अलावा उन्होंने अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक आर.के. नारायण की रचना 'मालगुड़ी डेज' पर आधारित सीरियल के साथ ही कई अन्य टेलीविजन सीरियलों में भी काम किया था।

तत्कालीन बॉम्बे (मुंबई) के पास माथेरन में 19 मई, 1938 को जन्मे कर्नाड ने कर्नाटक विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की थी। इसके अलावा वह ऑक्सफॉर्ड विश्वविद्यालय से आरहोड्स के छात्रवृत्तिधारी भी थे। यहां से उन्होंने दर्शन, राजनीति और अर्थशास्त्र की शिक्षा ली थी।

अपने नाटकों 'ययाति', 'तुगलक', 'हयवदन', 'नागमंडल', 'तलेदंड', 'अग्नि मत्तु मले' में उन्होंने लोक, आधुनिकतावाद के ऐतिहासिक संदर्भ, आजादी के बाद बदलते भारतीय संस्कृति, राजनीति, आर्थिक स्थितियों के परिवर्तनों को उजागर किया था

ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता, बहुभाषी विद्वान, कुशल नाटककार, पटकथा लेखक, अभिनेता, निर्देशक और भारत के सांस्कृतिक परिदृश्य में एक महानायक गिरीश कर्नाड का सोमवार को यहां उनके आवास पर निधन हो गया। वह 81 साल के थे।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री कार्यालय के एक अधिकारी ने बताया, "कर्नाड का उम्र संबंधी बीमारियों के कारण सुबह करीब 8.30 बजे अपने घर में निधन हो गया।"

दिवंगत अभिनेता के परिवार में उनके बेटे रघु हैं, जो पेशे से लेखक और पत्रकार हैं।

पारिवारिक सूत्रों के अनुसार, उनका निधन प्रसिद्ध कब्बन पार्क के करीब शहर के संपन्न क्षेत्र के लावेल रोड स्थित आवास में हुआ। उनके शरीर के कई अंगों ने कई दिनों से काम करना बंद कर दिया था।

गिरीश कर्नाड को ज्ञानपीठ पुरस्कार के अलावा पद्मश्री और पद्मभूषण से भी सम्मानित किया गया था। इसके अलावा उन्हें कई नेशनल फिल्म अवार्ड और साहित्य अकादमी से भी नवाजा गया था।

वह एक सम्मानित विद्वान भी थे, जिन्होंने कई सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर आवाज उठाई थी।

छह दशकों के कार्यकाल में कर्नाड ने ज्यादातर मुख्यधारा और ऑफबीट शैली की कन्नड़ और हिंदी फिल्मों में अभिनय किया था। इसके अलावा उन्होंने अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक आर.के. नारायण की रचना 'मालगुड़ी डेज' पर आधारित सीरियल के साथ ही कई अन्य टेलीविजन सीरियलों में भी काम किया था।

तत्कालीन बॉम्बे (मुंबई) के पास माथेरन में 19 मई, 1938 को जन्मे कर्नाड ने कर्नाटक विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की थी। इसके अलावा वह ऑक्सफॉर्ड विश्वविद्यालय से आरहोड्स के छात्रवृत्तिधारी भी थे। यहां से उन्होंने दर्शन, राजनीति और अर्थशास्त्र की शिक्षा ली थी।

अपने नाटकों 'ययाति', 'तुगलक', 'हयवदन', 'नागमंडल', 'तलेदंड', 'अग्नि मत्तु मले' में उन्होंने लोक, आधुनिकतावाद के ऐतिहासिक संदर्भ, आजादी के बाद बदलते भारतीय संस्कृति, राजनीति, आर्थिक स्थितियों के परिवर्तनों को उजागर किया था।

उनके नाटकों का अंग्रेजी सहित कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया गया है।

सन् 1970 में गिरीश ने 'संस्कार' के जरिए फिल्म निर्माण क्षेत्र में कदम रखा। उन्होंने इस फिल्म की पटकथा लिखने के साथ ही मुख्य भूमिका निभाई थी।

वहीं कर्नाड ने 'मालगुडी डेज' में स्वामी के पिता के रूप में और दूरदर्शन पर आने वाले विज्ञान के शो 'टर्निग प्वॉइंट' के प्रस्तुतकर्ता के तौर पर टेलीविजन के दर्शकों के बीच अपनी खास पहचान बनाई है। इसके अलावा भारतीय सिनेमा के दर्शकों पर उन्होंने 'मंथन', 'निशांत', 'पुकार', 'इकबाल', 'डोर', 'एक था टाइगर' से अपना प्रभाव छोड़ा है।

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कर्नाटक के मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी, पूर्व मुख्यमंत्री और जनता दल-सेक्युलर प्रमुख ए.डी देवेगौड़ा और केंद्रीय रसायन व उर्वरक मंत्री डी.वी. सदानंद गौड़ा ने उनके निधन पर संवेदना जताई है।


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